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Ich saz ûf eime steine |
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und dahte bein mit beine. |
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dar ûf satzt ich den ellenbogen. |
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ich hete in mîne hant gesmogen |
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daz kinne und ein mîn wange. |
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dô dahte ich mir vil ange, |
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wie man zer welte solte leben. |
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deheinen rât kond ich gegeben, |
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wie man driu dinc erwurbe, |
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der keinez niht verdurbe. |
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diu zwei sint êre und varnde guot, |
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daz dicke ein ander schaden tuot: |
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daz dritte ist gotes hulde, |
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der zweier übergulde. |
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diu wolte ich gerne in einen schrîn: |
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jâ leider desn mac niht gesîn, |
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daz guot und weltlich êre |
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und gotes hulde mêre |
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zesamene in ein herze komen. |
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stîg unde wege sint in benomen: |
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untriuwe ist in der sâze, |
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gewalt vert ûf der strâze, |
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fride unde reht sint sêre wunt. |
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diu driu enhabent geleites niht, |
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diu zwei enwerden ê gesunt. |
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Ich horte ein wazzer diezen |
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und sach die vische fliezen; |
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ich sach swaz in der welte was, |
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velt, walt, loup, ror unde gras. |
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swaz kriuchet unde fliuget |
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und bein zer erde biuget, |
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daz sach ich, unde sage iu daz: |
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der keinez lebet ane haz. |
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daz wilt und daz gewürme |
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der stritent starke stürme; |
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sam tuont die vogel under in, |
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wan daz si habent einen sin: |
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si duhten sich ze nihte, |
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si enschüefen starc gerihte. |
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si kiesent künege unde reht, |
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si setzent herre unde kneht. |
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so we dir, tiuschiu zunge, |
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wie stet din ordenunge! |
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daz nu diu mugge ir künec hat, |
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und daz din ere also zergat! |
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bekera dich, bekere, |
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die cirkel sint ze here, |
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die armen künege dringent dich. |
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Philippe setze en weisen uf, |
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und heiz si treten hinder sich! |
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Ich sach mit minen ougen |
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manne und wibe tougen, |
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daz ich gehorte und gesach |
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swaz iemen tet, swaz iemen sprach. |
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ze Rome horte ich liegen |
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und zwene künege triegen. |
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da von huop sich der meiste strit |
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der e was oder iemer sit, |
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do sich begunden zweien |
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die pfaffen unde leien. |
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daz was ein not vor aller not, |
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lip und sele lac da tot. |
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die pfaffen striten sere, |
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doch wart der leien mere. |
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diu swert diu leiten si dernider, |
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und griffen zuo der stole wider. |
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si bienen die si wolten |
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und niht den si solten. |
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do storte man diu goteshus. |
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ich horte verre in einer klus |
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vil michel ungebaere; |
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da weinte ein klosenaere, |
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er klagete gote siniu leit: |
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"Owe der babest ist ze junc; |
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hilf, herre, diner kristenheit!" |
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Ich saß auf einem Stein |
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und schlug ein Bein über das andere. |
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Darauf legte ich den Ellenbogen. |
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Ich hatte in meine Hand |
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das Kinn und meine eine Wange geschmiegt. |
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So dachte ich mit ängstlicher Sorgfalt, |
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wie man auf der Welt leben sollte. |
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Ich wusste keinen Rat zu geben, |
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wie man drei Dinge erwürbe, |
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von denen keines zu Schaden komme. |
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Zwei sind Ansehen und fahrendes Gut, |
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die sich häufig einander schädigen: |
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das dritte ist Gottes Gnade, |
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die mehr wert als die zwei anderen ist. |
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Diese wollte ich gerne in einen Schrein beisammen haben. |
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Führwar kann es leider nicht geschehen, |
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dass Besitz und Ansehen in der Welt |
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noch dazu Gottes Gnade |
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zusammen in ein Herz kommen. |
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Steg und Weg sind ihnen genommen: |
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Treulosigkeit lauert im Hinterhalt, |
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Gewalt herrscht auf der Straße, |
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Friede und Recht sind sehr wund: |
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Die drei haben keinen Schutz, |
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bevor die zwei nicht gesund werden. |
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Ich hörte einen Fluss rauschen |
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und sah die Fische schwimmen; |
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ich sah alles, was es auf der Welt gab, |
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Feld, Wald, Laub, Röhricht und Gras. |
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Alles, was kriecht und fliegt |
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und die Beine auf die Erde setzt, |
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das sah ich und sage Euch folgendes: |
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Keines von ihnen lebt ohne Feindschaft. |
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Die wilden Tiere und die Kriechtiere, |
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die fechten heftige Kämpfe aus; |
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ebenso machen es die Vögel untereinander, |
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nur dass sie in einem Punkt Vernunft haben: |
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sie kämen sichfür nichts vor, |
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wenn sie nicht ein starkes Gericht geschaffen hätten. |
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Sie wählen Könige und Ordnungen, |
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sie bestimmen Herren und Knechte. |
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Doch wehe dir, deutsches Volk, |
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wie steht es mit deiner Rechtsordnung! |
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Dass nun die Mücke ihren König hat, |
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und dass deine Würde so zu Grunde geht! |
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Kehre um, kehre um, |
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die Kronreife sind zu mächtig, |
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die kleinen Könige dringen auf dich ein. |
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Philipp setzte den Waisen auf, |
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und befiehl ihnen zurückzutreten. |
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Ich sah mit meinen Augen |
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der Männer und der Frauen Heimlichkeiten, |
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so dass ich alles hörte und erblickte, |
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was auch immer einer tat, was auch immer einer sprach. |
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In Rom hörte ich lügen |
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und wie man zwei Könige betrog. |
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Davon erhob sich der heftigste Kampf, |
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der jemals war oder je wieder sein wird, |
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als sich Pfaffen und Laien |
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in zwei Parteien zu spalten begannen. |
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Das war ein Bedrängnis vor allen anderen Bedrängnissen: |
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Leib und Seele lagen da tot. |
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Die Pfaffen kämpften heftig, |
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aber die Laien kamen in die Übermacht. |
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Da legten sie die Schwerter nieder |
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und griffen wieder zu der Stola. |
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Sie bannten die, die sie zu bannen wünschten, |
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und nicht den, den sie hätten bannen müssen. |
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Da zerstörte man die Kirchen. |
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Ich hörte fern in einer Klause |
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gar großes Wehklagen; |
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da weinte ein Klausner, |
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er klagte Gott sein Leid: |
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"O weh, der Pabst ist zu jung; |
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hilf, Herr, deiner Christenheit!" |